बस्तर | छत्तीसगढ़ (Bastar District In Chhattisgarh)
बस्तर
- बस्तर के बारे में सामान्य जानकारी
- बस्तर का इतिहास
- बस्तर की जनजाति
- बस्तर की संस्कृति
- घुमने वाले स्थान
- निष्कर्ष
बस्तर संभाग के बारे में सामान्य जानकारी:-
बस्तर ज़िला भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण दिशा में स्थित एक ज़िला है। बस्तर जिले और बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर है। इसका क्षेत्रफल 6596.90 वर्ग किलोमीटर है। बस्तर जिला कोंडागांव, दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर से घिरा हुआ है। बस्तर की आबादी में 70 प्रतिशत आदिवासी समुदाय हैं, जैसे गोंड, मारिया, मुरिया, भात्रा, हलबा, ध्रुव समुदाय है। बस्तर जिले को सात प्रखंडों/तहसील, जगदलपुर, बस्तर, बकावंद, लोहंडीगुड़ा, टोकाकल, दरभा में बांटा गया है .आदिवासी समुदाय के प्राकृतिक संसाधनों और साधारण जीवन शैली में भी बस्तर जिला समृद्ध है। बस्तर जिला घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों, झरनों, गुफाओं और जंगली जानवरों से भरा हुआ है। बस्तर जिले के लोग दुर्लभ कलाकृति, उदार संस्कृति और जन्मजात प्रकृति के धनी हैं।
बस्तर का इतिहास
बस्तर रियासत 1324 ईस्वी के आसपास स्थापित हुई थी, जब अंतिम काकातिया राजा, प्रताप रुद्र देव ( 1290-1325) के भाई अन्नाम देव ने वारंगल को छोड़ दिया और बस्तर में अपना शाही साम्रज्य स्थापित किया | महाराजा अन्नम देव के बाद महाराजा हमीर देव , बैताल देव , महाराजा पुरुषोत्तम देव , महाराज प्रताप देव ,दिकपाल देव ,राजपाल देव ने शासन किया |बस्तर शासन की प्रारंभिक राजधानी बस्तर शहर में बसाई गयी , फिर जगदलपुर शहर में स्थान्तरित की गयी । बस्तर में अंतिम शासन महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव (1936-1948) ने किया । महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव बस्तर के सभी समुदाय , मुख्यतः आदिवासियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। ‘दंतेश्वरी ‘, जो अभी भी बस्तर क्षेत्र की आराध्य देवी है , प्रसिद्ध दांतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा में उनके नाम पर रखा गया है।
इसके इतिहास के सूत्र पाषाण युग अर्थात् प्रागैतिहासिक काल से मिलते हैं. इन्द्रावती नदी के तट पर स्थित खड़कघाट, कालीपुर, माटेवाड़ा, देउरगाँव, गढ़चन्देला, घाटलोहंगा तथा नारंगी नदी के तट पर अवस्थित गढ़ बोदरा और संगम के आगे चितरकोट आदि स्थानों से पूर्व पाषाण काल, मध्य पाषाण काल, उत्तर पाषाण काल तथा नव पाषाण काल के अनेक अनगढ़ एवं सुघड़ उपकरण उपलब्ध हुए।
बस्तर की जनजाति:-
बस्तर की आबादी में 70 प्रतिशत आदिवासी समुदाय हैं, जैसे गोंड, मारिया, मुरिया, भात्रा, हलबा, ध्रुव समुदाय है।
जंगलो में पाई जाने वाली लगभग 90 % जनजातीय असभ्य व् हिंसक होती है। जिस प्रकार जंगली जानवर अपने इलाके की रक्षा के लिए अपनी जान तक दे सकता है ठीक इसी प्रकार ये जनजातीया अपने इलाके की रक्षा करती है, लगभग सभी जनजाती माँसाहारी होती है।
बस्तर की जनजाति निम्नलिखित है-
माडिया जनजाति
माड़िया एक जनजाति है, जो महाराष्ट्र के चन्द्रपुर और गढ़चिरौली जिलों में, तथा छत्तीसगढ़ के बस्तर प्रखण्ड में पायी जाती है। ये लोग गोंडी भाषा की माड़िया उपभाषा बोलते हैं। अबूझमाड़ के अनगढ़ जंगलों में निवास करने वाली इस जनजाति निवास ने आजतक अपनी मूल परंपरा और संस्कृति को सहेज कर रखा हुआ है। माड़िया जनजाति को मुख्यतः दो उपजातियों में बांटा गया है - अबुझ माड़िया और बाईसन होर्न माड़िया।
हलबा जनजाति
हल्बा जनजाति की भाषा हल्बी है, जो मराठी और ओडिया का संयोजन है।हल्बी या हल्बा, छत्तीसगढ़ राज्य में बहुतायात में पायी जाने वाली एक जनजाति है।यह जनजाति छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी पाई जाती है यह जनजाति एक विसाल जनजाति है।
मुरिया जनजाती
मुरिया जनजाति में गोदना विवाह प्रतिमान का एक हिस्सा है और यदि किसी कन्या द्वारा गोदना नहीं कराई है तो विवाह के समय जुर्मना लागाया जाता है। मुरिया जनजाति को बस्तर की मूल जनजाति कहा जाता है, अर्थात इस जनजाति के लोग हमेशा से इस इलाके में रहे हैं इस जनजाति के लोगों को श्रृंगार करना व कलात्मक वस्तुएं बनाना पसंद है. मुरिया जनजाति में माओपाटा के रूप में एक आदिम शिकार नृत्य किया जाता है जिसमे इस जनजाति के सभी पुरुष बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है।
भतरा जनजाति
भतरा जनजाति प्राचीन काल में सम्पूर्ण बस्तर जिले में फैली हुई थी इस जनजाति के लोग कला और नाटक प्रेमी होते थे। इन्हें पेंटिंग करना व् नाच गाना पसंद था, परंतु समय के साथ इस जनजाति के लोगो ने खुद में बदलाव किया और यह भी समय की दौड़ के साथ चलना सिख गए। आज भतरा जनजाति के लोगों ने आधुनिक बनना शुरू कर दिया है। इस जनजाति के लोग आज कल शहरों में रोजगार की लिए निवास करते हैं।
बस्तर की संस्कृति
बस्तर अपनी परम्परागत कला-कौशल के लिए प्रसिद्ध है। बस्तर के निवासी अपनी इस दुर्लभ कला को पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित करते आ रहे है, परन्तु प्रचार के आभाव में यह केवल उनके कुटीरों से साप्ताहिक हाट-बाजारों तक ही सीमित है। उनकी यह कला बिना किसी उत्कृष्ट मशीनों के उपयोग के रोजमर्रा के उपयोग में आने वाले उपक्रमों से ही बनाये जाते हैं।
कभी बस्तर में 36 बोलियां थीं, लेकिन अब गोंडी, हल्बी, भतरी, धुरवी, परजी, माड़ी जैसी गिनी-चुनी बोलियां ही बची हैं। बस्तर की कुछ बोलियाँ संकटग्रस्त हैं और इनके संरक्षण व संवर्धन की जरूरत है। बस्तर की दो दर्जन से अधिक बोलियां विलुप्त हो गई हैं।
बस्तर में घुमने के स्थान
बस्तर अपने पर्यटन स्थल की वजह से पुरे भारत मे प्रसिध है। आकर्षित पर्यटन स्थल की बस्तर की खूबसूरती पर चारचांद लगा देता है। आइये जानते है बस्तर के प्रमुख पर्यटन स्थल के बारे में-- चित्रकोट जलप्रपात (पढ़े इसके बारे में)
- कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान
- केलाश गुफा
- तीरथगढ़ गुफा
- कोटमसर गुफा
- नारायणपाल मंदिर
- तामडा घुमर
- मेंदरी घुमर जलप्रपात
- चित्रधारा जलप्रपात
- इन्देरावती राष्ट्रीय उद्यान
- दंतेश्वरी माता मंदिर
निष्कर्ष (conclusion): -
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